अंजन जी के एगो बेहतरीन रचना जवान-सुगना

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पं० राधा मोहन चौबे (अंजन जी)
पं० राधा मोहन चौबे (अंजन जी)

बढी माँ अपने जवान सैनिक बेटे के लिए कुछ संदेश, कुछ सामान उनके सैनिक साथी के हाथों भेजती हैं और समझाती हैं कि एक माँ के लिए नहीं, बल्कि करोड़ो माताओं की रक्षा करना, ईमान नहीं डोलना चाहिए।

बाबू ले ले जइह हमरो सामान हो, कि पूछिहें जवान-सुगना।
पानी में पनडुब्बी चढ़ि के, करे सिन्धु रखवारी।
रक्षा खातिर जागल होइहें, ले बनूरिव तइयारी,
उपरा गरजत होई नेटवा विमान हो – कि पूछिहे जवान सुगना ||1||

देखते तहके गले लगइहें – पूछिहे घर कुशलाई,
कइसे गाँव- नगर घर बाटे, कइसे बाड़ी माई,
कइसे बाड़े घर लरिका सेयान हो- कि पूछिहे जवान सुगना ||2|

सतुआ-चिउरा के गठरी, जाते दीह पहुँचाई,
भरूआ मरिचा कोने ओइमें दीहनी हम गठियाई-
पइहें नाँचे लागी खुशी से परान हो- कि पूछिहें जवान सुगना ||3|

कहि दीह कि बीबी उनके मंगल रोज मनावे,
तुलसी जी के साँझि-सबेरे धूप-दीप देखलावे-
माँगे खुशिए के सँझिया-बिहान हो- कि पूछिहें जवान सुगना ||4||

मति कहिह कि मइया तोहरी पाकल फल हो गइली,
चिट्ठी दीहली, काँपत रहली, जात-जात रो गइली
ना त बेकल होइहें बाबू के परान हो – कि पूछितें जवान सुगना ||5|

एगो माई खातिर कहिह, मति तनिको अकुलइहें,
लाख करोड़न माई लोग के गोदी लाज बचइहें –
कहिह, डोले नाहीं तनिको ईमान हो – कि पूछिह जवान सुगना ||6||

कहिह कि सावन में आ के राखी लीहे बन्हाई,
बहिना उनुके खोजत बाड़ी, कबले अइहें भाई –
कागा उचरेला सँझिया-बिहान हो- कि पूछिहें जवान सुगना ||7||

मुक्तक
हवा के झोंक पर पतइया डोलबे करी।
लहर उठी त नइया डोलबे करी।
माई के करेजा पूत खातिर मोम हवे।
बछरुआ बोली त गइया डोलबे करी।

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