कवनो बात बा जरुरे

कवनो बात बा जरुरे, तबे  संघे  रहत बा।
राह में  केहू राही के,  इन्तजार  करत  बा।।

केहू केहू के अइसे पुछेला ना,
नीमनो सुरतिया  रुचेला ना
सभ आके सट जाला, जब जरूरत परत बा…..

एके टक नजरि लगा के लोग रहेला,
कब    अइहें   बाबू  इहे   सभ  कहेला
मिले खातिर उनसे कुछ लोग हहरत बा……..

खुश होला देख के केहू परशान हो जाला,
समय जदि ठीक  बा तs बहुतो से पहचान हो जाला
देख के हँसी हमार काहें दोसर मरत बा……

तन   मइले  रहे दs,  मन   शुद्ध   राखs,
आगे आगे फटर फटर ढेर जनि भाखs
केहू आगे बढ़ता तs काहे केहू जरत बा……

सगरो बेरा एके जइसन रहे के चाहीं,
छने में भभक के ना बुताए  के  चाहीं
मनवा क बात कवि तोहरा से कहत बा…..

लोग क रवइया आज काल्ह ठीक  नाहीं लागता,
बा  हरान अपने में, कार में सभ केहू भागता
सभ केहू कंचन ए घरी चरत बा…..

बइठल बा कबे से अगोरता  हो,
कवनो बाति के लेके खोरता हो
छन छन समइया पल टरत बा….

मान बढवले अपना कुल खनदान के,
नाँव रोशन कइलें, दिववले पहचान के
बाप महतारी क पुनिया फरत बा……

मुश्किल बा केहू का बारे में बतावल,
बढ़ चढ़ के चलन भइल बा देखावल
इयाद में केहू का लोर ढरत बा……

दीपक तिवारी, श्रीकरपुर, सिवान।

भोजपुरी में दिनों के नाम

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