मिश्रवलिया के बाबा महेन्दर मिसिर : निर्भय नीर

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परनाम ! स्वागत बा राउर जोगीरा डॉट कॉम प, आज रउवा के सामने बा महेन्दर मिसिर जी के बारे मे कुछ अनछूआ पहलु। मिश्रवलिया के बाबा महेन्दर मिसिर जी के बारे मे हमनी के बता रहल बानी निर्भय नीर जी। निर्भय जी मिश्रवलिया के बाबा महेन्दर मिसिर जी के बारे मे जानकारी इक्कठा क के हमनी के सामने रख रहल बानी। रउवा सब से निहोरा बा कि पढ़ला के बाद आपन राय जरूर दीं आ रउवा निर्भय नीर जी के दिहल जानकारी अच्छा लागल त आगे शेयर जरूर करी।

पंडित महेन्दर मिसिर जी अब एह दुनिया में नइखी। उहाँ के मुअला आज करीब ७४-७५ बरिस हो गइल। बाकिर उनकर कीरति आजहूँ जिअते बा आ जब ले इहवाँ चान-सुरुज रहिंहे, तब ले ऊहाँ के कीरति जिअते रही। उनकर पुरुखा-पुरनिया लोग अपना के “लगुनी धरमपूरा” के कानकुब्ज बाराम्हन कहत रहीं। वोही लोगन में एक जाना सुखराम मिसिर जी रहीं, जिनकर बेटा श्री शिवशंकर मिसिर रहीं। आ ओहि शिवशंकर मिसिर के बेटा पंडित महेन्दर मिसिर रहीं।

पंडित महेन्दर मिसिर जी के जनम १६ मार्च सन् १८७६ में सारण जिला के काँही मिश्रवलिया गांव में भइल रहे। इहाँ के आपना बाप-मतारी के एकलौता बेटा रहीं। इहाँ के ममहर प्रतापपुर गांव जिला सारण रहे। बाकिर इन्हके सौतेली मतारी के जड़ से चार जाना भाई रहन। एह लोग में बड़ भाई पंडित गोरख नाथ मिसिर रहन। एह चारों भाई लोग के बहुते लर-जर फइलल- पसरल बा। बाकिर कुल्ही जाना में महेन्दरे मिसिर जी जेठ रहनी। महेन्दर मिसिर जी के एकही बेटा हिकायत मिसिर जी रहनी।

स्व० महेन्दर मिसिर जी के बाप स्व० शिवशंकर मिसिर छपरा के जमिंदार हनुमत सहाय के ठाकुर बाड़ी के पुजारी रहीं। ओहि जगह अपना लगहीं, आपन बेटा महेन्दर मिसिर जी के राखीं आ उनका के पढ़ावल-लिखावल भा गावल-बजावल के विद्या सिखवावे लगनी। ओह घरी महेन्दर मिसिर जी के उमिर १५- बरिस होखत रहे। ठीके कहल गइल बा कि……
“लड़िका के पढ़ाईं तऽ पढ़ाईं, ना तऽ शहर में बसाईं।”

इहे बात महेन्द्र मिसिर जी खातिर भइल। उहाँ के अपना बाबू जी के साथे छपरा में रहत-रहत पढ़े लिखे, गावे-बजावे, कथा-पुराण आ सत्संग में नीमने चलता-पूरजा हो गइनी।संस्किरित के ‘काव्य तीर्थ’ परीक्षा पास क लिहनी। एही तरे तब

पुरबी सम्राट महेन्दर मिसिर
पुरबी सम्राट महेन्दर मिसिर

तक ले इहे करत-धरत उहाँ का चालिस(४०) बरिस के हो गइनी। एने तब तक ले शिवशंकर मिसिर के अंत काल हो गइल। एकरा बाद महेंद्र मिसिर जी के कपारे घर-दुआर के सब जाल जंजाल पड़ गइल। महेंद्र मिसिर जी शहर में रहत-रहत भारी चालू-पूरजा हो गइनी।इहाँ के हरफनमौला रहीं। इहाँ के अब घूम-घूम के खूबे नीमन कथा-पुराण गा-बजा के कहे-सुनावे लगनी। इहाँ के कथा बड़ा रोचक, सरस आ लयदार होखे लागल। खूदे इहाँ के हरमुनिया, तबला, पखाउज, मृदंग, आ आउरी-आउरी साज बजावत रहनी। इनकर लयदारी गाना बजाना पर आच्छा-आच्छा गवैया, हाकिम-हुकाम, पढुआ-बेपढुआ आ देहात के सभ लोग रीझ जात रहन।

महेंद्र मिसिर जी के नांव सुन के लोग उनकरा के देखे आ उनकर गीत सुने खातिर बेहाल हो जात रहे। छपरा, बलिया, आरा, गया, गोरखपुर आ आउर-आउर जगहा के गवैया, गवनिहार, तवायफ आ गीत प्रेमी लोग उनकरा लयदारी पुरबी, खेमटा, दादरा, झूमर, गज़ल आ कवित पर रीझ के चेला बन जास। इहो लोग कहेला कि उहाँ के आसु कवि भी रहनी। राहे-पेंरा चलते-बोलते, दनादन कविता आ गीत बना देत रहीं आ गावे लागत रहीं।

निर्भय नीर जी
निर्भय नीर जी

महेंद्र बाबा जवने मंच पर उतरस, तवने में बाजी मारी लेत रहीं। उनकरा गुन के सुन के, देख के लोग उनकरा पर लोभा जात रहन। देहो तऽ इनकर ओही लेखा रहे। मझौला कद के आदिमी रंग गोर, कड़इल मोंछ, कपार पर कधी टोपी, देह में लामा, पंजाबी कुरता, हाथि नियन झूमत चाल, हंसत हंसावत आ ठिठोली करत मिसिर जी के व्यक्तित्व केहू के मोह लेत रहे। उहां के ढ़ेर भाखा बोली के समुझे बुझे के रेआज कइले रहीं। उहां का भोजपुरी,अंगरेजी, बंगला, हिंदी,आ उर्दू बोल लिख लिहीं। संस्कृत त उहांका पढ़ले ही रहीं। इहाँ के सभ रचना भोजपुरी आ अपभ्रंश खड़ी बोली में भइल बाटे।

मसखरई में त इहां के नामे रहे। बाकिर उहां के छोट मोट एगो लड़निहारो रहीं। गदहा लोट आ धोबिया पाट कुस्ती के पेंच इनकर खूबे सधल रहे। मारामारी में इनकर लाठी दुस्मन के देहि पर पहिलहीं बुनी नियन भदा-भद गिरे लागे। हाजिर जवाबी में त अउवल नम्बर के रहीं। जबाब-सवाल में बड़का-बड़का बोल्लकड़ के मुंह में जाबी लगा दिहीं। आछा-आछा पढ़निहार-लिखनिहार के मन के मइल झाड़ देत रहीं। इहाँ के दूअरा अइसन कवनो दिन ना होत रहे कि दस पांच आदिमी के जूठ ना गिरे। दूआर पर मेला लागल रहत रहे। इहां के दुआर पर रोजे दु चार गो हाथी-घोड़ा एक्का-बघी आइले रहे। गाना-बजाना के झमेला लागले रहत रहे। अपना खास सवारी खातिर जिनिगी भर एगो ना एगो अविलाखी घोड़ा रखले रहि गइनी।

महेन्दर बाबा जवना-जवना बड़का शहर में गइनी, तवना-तवना शहर के नामी-गिरामी आ धनी-मनी बड़कन के अपना हिकमत से चकमा में डाल देहलन आ ओह लोगन से मोट माल हाथे लगा लेलन। इलाहाबाद, कलकत्ता, रंगून,आ आउरी-आउरी जगहन से ढ़ेर रोपया कमइलन।

इहाँ के एक बेर नोट बनावे, गिन्नी भंजावे, के कसूर में अपना साथी समाजी के साथे पकड़ा गइल रहीं। वोह मोकदमा में इहाँ के सात बरिस के जेल के सजाय भइल रहे। बाकिर आछा आचरण के कारण चारे बरिस पर बक्सर जेल से छूट गइनी। वोही घड़ी “विनोदी तवाएफ” उनकरा पर गीत बनवली आ जहांँ-तहांँ गावत रहली।

नोटवा के छापि-छापि गिनिया भंजवल।
पड़ले पुलिसिया से काम, ए महेन्दर मिसिर।।

चारो ओरि घेरि लिहले मुनसी दरोगवा।
छपरा से अइले कप्तान, ए महेन्दर मिसिर।।

खुफिया पुलिस सभ घुमले नगरिया में।
मिसिरवलिया में भइलऽ गिरफ्तार, ए महेन्दर मिसिर।।

नोटवा कारन मिसिर गइले जेलखाना।
केहू नाहिं कइले तोहर साथ, ए महेन्दर मिसिर।।

कहत “विनोदी ताएफा” सुनु मोरा बतिया हो।
छाड़ि देहु नोटवा के आस, ए महेन्दर मिसिर।।

जेहल जाये के पहिले महेन्दर मिसिर का एगो साधु से भेंट भइल रहे। साधु साक्षात महावीर जी रहन। साधु कहले कि……

“तूं एगो गीत रामायण के रचना कर। तोहरा पर भगवान जी खुश बाड़न।एह काम में तोहरा सफलता मिली। तब तोहरा बक्सर में विस्वामित्र जी के आश्रम के भीरी राम जानकी के दर्शन होखी।”

ई बात खुदे पंडित महेन्दर मिसिर जी अपना हाथ के लिखल ‘गीत रामायण’ के भूमिका में लिखले बानी। ठीक-ठीक छव सात बरिस के बाद बक्सर में मिसिर जी का चार बजे रात में राम जानकी के दर्शन भइल। वोही घड़ी से इहां का राम-जानकी के भजन आ कीर्तन में रम गइनी। तब से मरे तक ले उहां का घूम-घूम के कथा-पुराण कहे आ भजन-कीर्तन करे लगनी।एह तरे उहां का भोजपुरी आ खड़ी बोली में मुलुकन के पद बनावे लगनी। नीचे के पद से मालूम हो जात बा, जे बुढ़ारी में एकदमे भगतिआ गइल रहीं।

🌹कवित🌹

राग किन्हो रंग किन्हो संग वो कुसंग किन्हों।
चातुरी अनेक किन्हों, लाय हाथ चोली में।।

शास्त्र वो पुरान पढ़े, भाषा सब देसन के।
विजय पत्र लिन्हों, जाय देश देशन की बोली में।।१।।

महल वो अटारी भी तैयारी सब भांति किन्हों।
अइसही बितायो निसि बासर ठठोली में।।

द्विज महेन्दर घोड़े रथ हस्तिन के पीठ चढै वो।
अंत में चढ़ेंगे आठ काठ के खटोली में।।

पंडित जी ढ़ेर खानी गीत भजन आ नाटक लिखले बानी। थोड़ी-सा वोह में से उहां का किताबन के रुप में छपववले बानी। छपल किताबन में जहवां तक ले पता चलत बा तवन नीचे लिखल बा।

(१) महेंद्र मंजरी- चार भाग में।
(२) महेन्द्र चंद्रिका- तीन भाग में।
(३) महेंद्र बिनोद
(४) महेंद्र मंगल- चार भाग में।
(५) महेंद्र कृत अपूर्व रामायण- बाल काण्ड।

कुछ महेन्दर मिसिर जी के बेछपल किताबन के नांव के भी पता चलल बा जवना में

(१) उषा हरण नाटक
(२) उधो वृन्दावन गमन
(३) चीर हरण लीला
(४) विनय कवितावली
(५) गीत रामायण- आठो काण्ड।
(६) गोपी विरह नाटक।

हाथ के लिखल (बेछपल) ई सब किताब मिसिर जी के जन्म धरती कांही मिसिरवलिया गांव में मिलल। जवना में गीत-रामायण बालकाण्ड में ४४८ पन्ना आ अयोध्याकांड में १५४ पन्ना बाटे। शेष छव कांड गीत-रामायण के पाण्डुलिपि मिसिर जी के ससुरारी तेनुआ (छपरा शहर के नियरे) गांव में रखल रहे जवन अब उनकरा जन्म धरती मिसिरवलिया में बा। आठो कांण्ड गीत-रामायण के रचना करे में उनकरा सात बरिस लागल रहे। यानि ०७/०५/१९२५ से ०९/०५/१९३१ ई० तक के समय में रामायण के रचना भइल। ई बात मिसिर जी आपन लिखल गीत-रामायण के भूमिका में लिखले बानी।

महेन्दर मिसिर जी बेछपल आ छपल किताबन में नीचे लिखल पद (छंद) बाटे।

कवित, कजरी, काफी होमी, खेमटा, गज़ल, चौपाई, चौबोला, छंद, झूमर, ठप्पा, डफ के होली, दोहा, दादरा, धुरपद, छपैथिये ट्रिकल, नवटंकी, पुरबी, स्थाई, सोरठा, सोहर, सवैया, राग असवारी, राग केदारा, लखनी, चइता, होली, झपताला, घनाक्षरी, राग मलार, धुन राधेश्याम, राग विहाग, राग विभास बगैरह।

मिसिर जी के चौबोला, झूमर, गज़ल, दादरा आ पूरबी खूबे मार्मिक आ सरस होखे। अइसे त उनकर सब गीत-भजन बड़ा लहरदार होखे। साज लेके जहवां ई गावे लागस उहवां लोग इन्करा के देखे आ इनकर गीत सुने खातिर टूट पड़े। आ घेरवाटा लागा देस। जवनी घड़ी ई आलाप लेवे लागस वोह घड़ी बुझाए कि अमरित झड़त बा।

एह तरहे इहे करत-धरत मिसिर जी के उमिर करीब ७० बरिस के हो गइल। उहां का अपना बाल-बच्चन खातिर ढ़ेर जगे-जमीन, जमिंदारी आ रोपया पइसा हासिल कइनी। साथे-साथे उहाँ के कीरति भी फइलल। बाकि जादे गाना बजाना आ घोड़सवारी कइला से अंत में उनकरा दामा के बेमारी हो गइल। तब उहाँ का आपन जन्म धरती मिसिरवलिया छोड़ के छपरा के अपना मकान में रहि के दावा-बीरो करावे लगनी। एक दिन उहां के अचके में अपना साथी-समाजी के बोलवनी । जवना में उनकरा घर के लोग भी मिसिरवलिया से छपरा पहूंचल। तब उहां का कहनी कि…….
“सब केहू गीता रामायण बांच के हमरा के सुनाव। काहे कि हमार परवाना अब राम जी किहां से कट चुकल बा।”

एह तरहे सबे गीता रामायण क सुनावते रहे, तब तक ले २८/१२/१९४६ ई० में शनिचर के चार बजे दिन में मिसिर जी आँख हमेशा खातिर मूँद लेहनी। आ भोजपुरी पूरवी के जन्मदाता के काल के अंत हो गइल।।

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