विद्या शंकर विद्यार्थी जी के लिखल भोजपुरी गजल

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अँजोरिया चान के अब लगावत नइखे
पहिले अइसन अब हँसावत नइखे

भइल आदमी नियन ना जज्बाती जबकि
लहकल आगके अब बुतावत नइखे

हेराइल नींद बा त आँखी में बेचैनी बाटे
ओकरा से बातो के कौनो अदावत नइखे

संशय में जीव बा कि भइल का भइल
चुपे आके भी कबो समझावत नइखे

सोचे के बात बा विद्या नीर पिहीं कइसे
हुलसत अपने बिया, हुलसावत नइखे।

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बात बुताई कइसे जहाँ धुआँ बाटे
घात जाई कइसे जहाँ धुआँ बाटे

राय मसबरा बनि त ना शक बोके
रात पोठाई कइसे जहाँ धुआँ बाटे

घूँघट में लजाला केहू मर्यादा तक
आश चोन्हाई कइसे जहाँ धुआँ बाटे

दर्द तहरो छाती में दर्द हमरो दिल में
बात कहाई कइसे जहाँ धुआँ बाटे

गलती के एहसास से ना होई विद्या
चाँद लखाई कइसे जहाँ धुआँ बाटे।

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घर बसइलीं त रखलीं आग, गलती खुद कइलीं
कइलीं आस डाही ना आग, गलती खुद कइलीं

आग के तऽ धरम ह ठण्ढाई आ दोबारा धुआँई
द्वंद्दी खेली पतिअइलीं फाग, गलती खुद कइलीं

काढ़ता छतर फन मारे के मारतो बा पलखत से
काढ़ा पीअइलीं पललीं नाग, गलती खुद कइलीं

दोबारा गलती कवनो अब ना, ना होखे के चाहीं
खुदे कलम लिखलीं दुर्भाग्य, गलती खुद कइलीं

जेतना घात भइल बा विद्या बिस्वास में भइल बा
मान लिहलीं दामन होई पाक, गलती खुद कइलीं।

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लोहा पीट के लोहार हो गइलीं
माटी गढ़ के कोंहार हो गइलीं

आँखिन के परदा उठल तोहार
जाति से उठ के तोहार हो गइलीं

तोहरे दिरिस्टि बा कि तरजीह देला
हृदय में बस के होनहार हो गइलीं

कब के दुनिया धूर में दबा देलस
सृजन कइलीं त सोनार हो गइलीं

बात बेबाक कहे में निडर बानी
कलमे ना कलम के धार हो गइलीं।

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