विरल व्यक्तित्व: हरिशंकर वर्मा

स्वर्गीय हरिशंकर वर्मा भोजपुरी के साहित्यिक जगत के एगो विशिष्ट आ विरल व्यक्तित्व रहले । उनका जिनगी के हर पहलू में, स्तर आ परिस्थितियन के विभिन्नता के अजब समायोजन भइल रहे । वर्मा जी के विशिष्टता आ विरलता ई रहे कि एह सब स्तर आ परिस्थितियन के बड़ा प्रेम आ निष्ठा से स्वीकार कइले आ ओह सबके बीच बड़ा सहजता से तालमेल बइठवले । एह सहजता के वजह ई रहे कि अपना जिनगी में कवनो तरह के ग्रंथि पनपहीं ना दिहले, आ अपना छोट-बड़ हर अवसर आ परिस्थिति का प्रति, हर कर्तव्य आ दायित्व का प्रति, बहुते जागरूक आ ईमानदार बनल रह गइले । वर्मा जी के व्यक्तित्व के विश्लेषण से, उनका हर काम का प्रति उनकर निष्ठा, ईमानदारी आ संलग्नता के पता पावल जा सकेला ।

विरल व्यक्तित्व: हरिशंकर वर्मा

वर्मा जी के पदीय हैसियत काफी ँच रहे, जवना का साथे कई तरह के वर्जना आ रिजर्वेशन लागल रहे; आ ओकरा के निवाहत, अपना के ओह सब क्षेत्रन से जोड़ले रहल बड़ा कठिन रहे, जवना में उनकर सक्रियता फइलल रहे । बाकिर, एकरा बावजूद, अपना के हर तरह के उच्च भा हीन भावना से ऊपर उठा के, ओह सब सक्रियता में अपना के ईमानदारी से लगवले, आ अपना चिन्तन मनन से, संलग्नता-सक्रियता से, अध्ययन-लेखन से, आ ओह सब के संगठनात्मक कार्य-कलाप में आपन समर्पित योगदान से, अपना भाषा, साहित्य, संस्कृति, परिवेश आ समाज के अद्भुत सेवा कइले । अगर जो ई उन्मुक्त आ उदारता उनका जिनगी के अंग ना बरल रहित, तं टेल्को के असिस्टेंट जेनरल मैनेजर मिस्टर एच.एस. वर्मा खातिर, जमशेदपुर के अफसराना ठस्सा वाला माहौल से अपना के निकाल के, गाँव-गवई के उपेक्षित भाषा भोजपुरी के लेखक हरिशंकर वर्मा का रूप में प्रस्तुत कइल, आ भोजपुरी खातिर राँची, बिलासपुर आ सारन जिला के अमनौर जइसन दूर देहातन में छिछिआइल-फिरल सम्भव ना होइत ।

विरल व्यक्तित्व: हरिशंकर वर्मा
विरल व्यक्तित्व: हरिशंकर वर्मा

भोजपुरी का प्रति वर्मा जी का हृदय में अपार प्रेम रहे, आ एकरा कार्य-कलाप से जुड़े में बहुते हुलास के अनुभव करत रहले । भोजपुरी के कवनो छोटहनो काम के काफी महत्व देत रहले आ ओकरा खातिर मनसा-वाचा-कर्मणा सहयोग करे में अपना के धन्य मानत रहले । भोजपुरी खातिर अपना व्यस्त जिनगी में से समय निकाल के आ आपन श्रम आ धन लगा के उनका बहुते सन्तोष आ सुख मिलत रहे । अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के कार्य-समिति भा प्रवर समिति के साधारणो बैठक भरसक छोड़त ना रहले; आ समयाभाव के चलते, जमशेदपुर से कार से राँची आ राँची से हवाई जहाज से पटना पहुँच के, बैठक में शामिल होके, ओही साधन से जमशेदपुर लवटे के यात्रा-खर्च उठावे में, उनका तनिको हिचक ना होत रहे । अपना जिनगी के आउर-आउर महत्वपूर्ण काम से तनिको कम महत्व भोजपुरी के ना देत रहले । पतरातू में आयोजित भोजपुरी के संगोष्ठी में जाके भाषण कइल उनका ओतने प्रिय रहे जेतना होनोललू में आयोजित सेमिनार में जाके पेपर पढ़ल । अइसन रहे भोजपुरी का प्रति उनकर आन्तरिक संलग्नता आ प्रेम ।

‘प्रेम’ के इहे उपलब्धि उनका जिनगी के उद्देश्य आ हेतु दूनू बनत गइल; अइसन कि जीवन के अन्तिम भाग में भौतिक समृद्धि से मन भर गइल आ अध्यात्म चिन्तन जिनगी के अंग बन गइल आस्थावादी जमीन पर उदात्त जीवन-मूल्य के अन्वेषण का क्रम में प्रेम आ प्रार्थना के प्रसाद पाके उनकर जीवन धन्य हो गइल । ‘आखिरी गीत’ उनका एही धन्यता के प्रतीक बाटे ।

स्वर्गीय हरिशंकर वर्मा जी
स्वर्गीय हरिशंकर वर्मा जी

हमरा जहाँ ले इयाद पड़त बा, हरिशंकर वर्मा जी से हमार पहिल भेंट 1978 का दिसम्बर में, जमशेदपुर में, सिंहभूमि जिला भोजपुरी समाज का जलसा में भइल रहे । वर्मा जी ओह समारोह के अध्यक्षता कइले रहले आ हम रहीं विशिष्ट अतिथि । अपना अभिनन्दन का उत्तर में हम जे भाषण कइले रहीं ओह में, भोजपुरी में जरूरत का मोताबिक तत्सम शब्दन के प्रयोग आ ओकर यथारूप वर्तनी अपनावे के वकालत कइले रहीं । भोजपुरी के साहित्यिक जगत में ओह घड़ी ई सवाल बहुत चर्चा के विषय बनल रहे, काहे कि सरकारी स्तर पर भोजपुरी अकादमी के गठन हो चुकल रहे आ ‘भोजपुरी अकादमी पत्रिका’ के प्रवेशांक में जवन भाषा-नीति अपनावल गइल रहे बहुते विवाद उठा चुकल रहे । भोजपुरीकरण का फेर में तत्सम शब्दन के रूप बिगाड़-बिगाड़ के जवना भाषा के रचना ओह पत्रिका का माध्यम से कइल गइल रहे, ओकरा प्रति सुधी विद्वानन का मन में बड़ा आक्रोश रहे । ओही आक्रोश के अभिव्यक्ति हमरा भाषण में भइल रहे । अपना अध्यक्षीय भाषण में वर्मा जी हमरा भाषा-नीति के समर्थन आ सराहना कइले आ कहले कि भोजपुरी के अगर जो विचार के भाषा बनावे के बा त जरूरत का मोताबिक तत्सम शब्दन के प्रयोग से बचल संभव नइखे आ अइसन परिस्थिति में ओकर रूप खा-म-खा बिगाड़ल उचित नइखे ।

एह जलसा का कुछ दिन बाद, भोजपुरी संस्थान के पत्रिका ‘उरेह’ (4/1) का सम्पादकीय में, ‘भोजपुरी अकादमी पत्रिका’ के प्रवेशांक पर आपन प्रतिक्रिया व्यक्त करत हम अकादमी के भाषा-नीति के कटु आलोचना बड़ा विस्तार से कइले रहीं आ तत्सम शब्दन के यथारूप वर्तनी के जोरदार समर्थन करत ‘भोजपुरी अकादमी पत्रिका’ के सम्पादक के बहुते रगड़ाई कइले रहीं । हमार सम्पादकीय पढ़के, वर्मा जी हमरा के एगो लम्बा चिट्ठी लिखके हमरा के बधाई देले रहले, आ साथ-साथे नरम रुख अपनावे के आ भरसक कटूक्ति आ व्यंग्योक्ति से बचे के नेक सलाह देले रहले । ओह सलाह के हम बड़ भाई के अनुशासन मान के माथे चढ़वली आ उनकर सन्तुलित चिन्तन आ शिष्ट-सौम्य व्यक्तित्व का प्रति हमार आदर बढ़ गइल ।

तबे से, भोजपुरी भाषा आ साहित्य, भोजपुरी संगठन आ आन्दोलन आउर भोजपुरी प्रचार आ प्रकाशन का दिसाईं, समय-समय पर चिट्ठी-पत्री के जे सिलसिला हमरा-उनका बीच जारी भइल उनका आखिरी समय ले चलत रहल । वैचारिक आदान-प्रदान वाली एह चिट्ठियन के भाषा बरोबरे भोजपुरी रहल ।

आगे चलके ई सम्पर्क आत्मीयता में बदलल आ एगो बड़ भाई का रूप में वर्मा जी हमरा मिल गइले । हमरा निजी जीवन में रुचि लेवे लगले आ हमरा व्यक्तिगत समस्या सभन के समाधान का दिसाईं कई बेर सक्रिय प्रयास कइले । मित्रन के सहायता कइल वर्मा जी के स्वभाव रहे मित्रे काहे, अपना परिवेश से सम्बद्ध हर केहू के सुख-दुख के ख्याल हमेशा राखत रहले । जवना उदारता, सहानुभूतिशीलता, परदुखकातरता, विनम्रता, सज्जनता आ सदाशयता के जिनगी जियले, विरल बाटे ।

सन् 1981 का 6-7 जून के, सम्मेलन के छठवाँ अधिवेशन जमशेदपुर में आयोजित भइल । आमंत्रक रहले सिंहभूमि जिला भोजपुरी समाज का ओर से श्री रामवचन तिवारी । हम चाहत रहीं कि आमंत्रक होखस जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद् का ओर से स्व. हरिशंकर वर्मा आ डॉ. रसिक बिहारी ओझा ‘निर्भीक’ । तब, निर्भीक जी ‘डॉक्टर’ ना भइल रहले, बाकिर ओकरा प्रयास में लागल रहले । शोध-कार्य के उनकर व्यस्तता कुछ अइसन रहे कि अधिवेशन करावे के भार से कतराये लगले हमार प्रस्ताव सुनके वर्मा जी के मन त चपचपाइल, बाकिर निर्भीक जी अनठिया दिहले । आ तब, वर्मा जी के चुप हो जाए के पड़ल । अइसन हालत में, सिंहभूमि जिला भोजपुरी समाज का ओर से प्रस्तुत श्री रामवचन तिवारी के आमंत्रण स्वीकार हो गइल; आ वर्मा जी आ निर्भीक जी अपना के एह दायित्व के मुक्त महसूस कइले । बाकिर ई दूनू आदमी मुक्त ना रह सकले । अधिवेशन के व्यवस्था आ प्रचार में अभाव के अनुभव करत, एह दूनू जना के आगे बढ़के हाथ लगावहीं के पड़ल । वर्मा जी के तत्परता आ संलग्नता ओह घड़ी देखे में आवत रहे; जइसे गाँव के बेटी का बियाह में, इंतजाम के कमी-बेशी पूरा करे खातिर, गाँव के माथ-मालिक आके खड़ा हो गइल होखस ।

जमशेदपुर अधिवेशन के एगो आउर बात इयाद पड़ता, जवना के सम्बन्ध वर्मा जी से दा । अधिवेशन के मनोनीत उद्घाटनकर्ता ना पहुँच सकले । एह उमेद में कि काम शुरू होखत-होखत आइए जइहें, कवनो वैकल्पिको व्यवस्था ना कइल गइल । कार्यक्रम के संचालन हमहीं करत रहनीं । हमरा बगल में बइठल रहले निर्भीक जी । मंगलाचरण होखे लागल त हम निर्भीक जी से पूछली कि उद्घाटनवाला आइटम काहे ना छोड़ दिहल जाय । निर्भीक जी सामने कुर्सी पर बइठल हरिशंकर वर्मा जी का ओर इशारा करतं कहले कि वर्मा जी त बड़ले बानी, उहे से उद्घाटन करा लिहल जाय । तले मंगलाचरण खतम हो गइल । वर्मा जी से पूछहूँ के समय ना रहे । आ हम माइक पर मनानीत उद्घाटनकर्ता के ना पहुँचला के बात बतावत वर्मा जी से उद्घाटन करके अनुरोध कइली । सामने का कुर्सी से उठके धीरे-धीरे चलत वर्मा जी मंच पर माइक का सामने अइले आ बोले के शुरू कइले । लगभग पैंतालीस मिनट तक उद्घाटन भाषण कइले । सभा शांति आ मनोयोग में भाषण सुनत रह गइल । भाषण एतना सारगर्भित, ओजस्वी आ प्रभावशाली भइल कि ओइसन भाषण ओह अधिवेशन में दोसर ना भइल । भोजपुरी भाषा, साहित्य आ संस्कृति पर आपन सुलझल विचार वर्माजी बड़ा प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत कइले, जवना के अद्भुत प्रभाव पड़ल, आ समा बँध गइल । हमरा ओही दिने उनका बक्ता व्यक्तित्व के ओजस्वी स्वरूप से साक्षात्काभइल । आह अधिवेशन का दोसरका दिने ‘भोजपुरी कहानी : आटवाँ दशक’ विषयक संगोष्ठी में भी वर्मा जी बोलल रहले. आ ‘भोजपुरी के व्यक्तिगत निबन्ध’ विषयक संगोष्ठी के अध्यक्षतो कइले रहले ।

अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन से वर्मा जी के सम्बद्धता आ संलग्नता के शुरुआत जमशेदपुर का अधिवेशन से भइल, आ दिनोदिन प्रगाढ़ होत गइल । तब से अपना जिनगी के आखीर ले. सम्मेलन के हर अधिवेशन में काफी सक्रिय रूप में शरीक होत रहले । सम्मेलन के सातवाँ आ आठवाँ सत्र में प्रवर समिति के सदस्य चुनल गइले आ नउवाँ सत्र में सम्मेलन के उपाध्यक्ष भइले, जे जिनगी का आखीर ले रहले । * भोजपुरी सम्मलन पत्रिका’ के प्रकाशन में अर्थाभाव आड़े ना आवे पावे, एकरा खातिर अक्सर ‘ग्राम विकास केन्द्र’ (जमशेदपुर) के, जवना के पदेन सचिव रहले, विज्ञापन ‘भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’ में प्रकाशनार्थ भेजवावत रहले । भोजपुरी के कुछ विशिष्ट साहित्यकारन का बारे उनका पता चलल कि अर्थाभाव से लोग सम्मेलन के सदस्य नइखन हो पावत, त एके साथे दस गो साहित्यकारन खातिर आजीवन सदस्यता शुल्क सम्मेलन-कार्यालय के भेज दिहले ।

सातवाँ अधिवेशन सारन जिला के एगो गाँव अमनौर में भइल रहे । ओहू में बड़ा सरधा से शामिल भइले आ देहात में जाए से तनिको ना हिचकिचइले । ‘भोजपुरी कथा साहित्य आ सामाजिक चेतना’ विषयक सांगेष्ठी में सामाजिक चेतना का बारे में प्रस्तुत उनकर व्याख्या से बहस के मुद्दा साफ भइल रहे।

आठवाँ अधिवेशन (बिलासपुर) में खुलल-अधिवेशन के सम्बोधित करत भोजपुरी के सांगोपांग विकास के छटपटाहट बड़ा, प्रभावकारी ढंग से व्यक्त कइले । ‘भोजपुरी साहित्य में भोजपुरी संस्कृति के अभिव्यक्ति’ विषयक संगोष्ठी के अध्यक्ष का रूप में अपना हृदय के बात कहत उनका बड़ा खुशी भइल रहे कि “हमनी के जवन परम्परा रहल बा, जवन पुरखन से धरोहर मिलल बा, हमनी के स्वभाव में जवन घुल-मिल गइल बा, ओकर अभिव्यक्ति होला त बहुत नीक लागेला, अपने रूप ओमें झलकेला आ एह अपनइती के पाके काम करे में बड़ा बल मिलेला ।” भोजपुरी संस्कृति का बारे में उनका मन में बड़ा गर्व आ गौरव के भावना रहे, जवना के व्यक्त करत ओह संगोष्ठी में कहले रहले कि -“भोजपुरी संस्कृति जतने सहज बा ओतने बेजोड़ भी । भोजपुरी संस्कृति के पहिला विशेषता एकर संकोच के भावना बा । एहमें पूज्य भाव, आदर भाव, स्नेह भाव आ लालित्य के यथोचित स्थान बा । अन्य विशेषता में श्रेष्ठता के भावना बा । लोगन के चरित्र मेहनती रहल बा । सादा जीवन आ उच्च विचार भोजपुरी संस्कृति के मूल मंत्र रहल बा । एह क्षेत्र में वीरता के भावना आ अतिथि-सत्कार बेजोड़ रहल बा । भोजपुरी संस्कृति रूपी धारा लोक साहित्य आ शिष्ट साहित्य में खूब बहल बा ।”

भोजपुरी संस्कृति आ भोजपुरी लोक-जीवन के बहुते असर वर्मा जी के मन पर रहे आ भोजपुरी लोकगीत के संकलन आ अध्ययन-अनुशीलन में आपन काफी समय लगवले रहले । ‘पलना से पालकी’ शीर्षक से लिखल लेखमाला में, चुनल-बीछल भोजपुरी लोकगीत के संकलन आ अध्ययन प्रस्तुत कइले रहले । एह लेखमाला के कुछ लेख भोजपुरी के पत्र-पत्रिकन में छपलो रहे । एह लेख-माला के, एही नाम से, पुस्तकाकार प्रकाशित करेके उनकर योजना रहे, जवन उनका जीवन-काल में कार्यान्वित ना हो सकल । खुशी के बात बा कि उनकर पत्नी आ पुत्र लोग उनका अप्रकाशित साहित्य के प्रकाशित करे खातिर कृतसंकल्प बा ।

राँची में, सम्मेलन के नउवाँ अधिवेशन में ‘भोजपुरी कथा साहित्य : विकास के चरण’ विषयक संगोष्ठी के अध्यक्षता वर्माजी कइले रहले । वक़्ता लोगन के भीड़वाला एह जीवन्त संगोष्ठी में नवहा कथाकारन के नोक-झोंक पर कुछ बुजुर्ग लोग झोंझ मचावे लागल त वर्मा जी के अपना प्रशासनिक युक्ति के उपयोग करेके पड़ल आ बात सलटावे खातिर अपना अध्यक्षीय भाषण के एवज में एगो बुजुर्ग के भाषण करेके अवसर देके वातावरण के सम्हार लिहले । उनका प्रत्युत्पन्नमतित्व आ प्रशासनिक क्षमता के ई एगो उदाहरण रहे जवना के दर्शन एह साहित्यिक संगोष्ठी में भइल

राँची अधिवेशन का कुछ बरिस पहिले, पतरातू धर्मल पावर स्टेशन अवस्थित भोजपुरी के सक्रिय संस्था ‘भोजपुरी परिवार’ का जलसा में, वर्मा जी का अध्यक्षता में हमार अभिनन्दन, उनका भाषण का चलते हमरा हमेशा इयाद रही । हमरा साहित्यिक कार्य-कलाप के विवरण जवना आस्फालित शैली में वर्मा जी प्रस्तुत कइले उनका अभिव्यंजना शक्ति के परिचायक रहे । जवना शैली में लेखक लिखे, ओही शैली में भाषण करे, अइसन बिरले देखे के मिलेला ।

सन् 1986 में वर्मा जी के निबन्ध ग्रंथ ‘आखिरी गीत’ के प्रकाशन भोजपुरी संस्थान, पटना से भइल । भोजपुरी संस्थान के ई बत्तीसवाँ प्रकाशन रहे, आ वर्मा जी के दोसरकी भोजपुरी पुस्तक । भोजपुरी में लिखल उनकर पहिलकी किताब ‘जीवन गीता’ 1978 में भा ओकरा पहिलही. जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद् से प्रकाशित हो चुकल रहे आ आगे चलके ओकर दोसरका संस्करण भी निकलल । भोजपुरी संस्थान के हम अध्यक्ष बानी आ संस्थान के प्रकाशन-कार्य के अच्छा असर वर्माजी के मन पर रहे, एह से उनकर इच्छा भइल कि ‘आखिरी गीत’ हमरा देख-रेख में छपे आ भोजपुरी संस्थान से प्रकाशित होखे । हम उनकर आदेश शिरोधार्य कइली आ ई पुस्तक हमरे देख-रेख में छपल आ भोजपुरी संस्थान से प्रकाशित भइल । ई पुस्तक हमरा पूज्य पिता आ भोजपुरी के समर्थ साहित्यकार (अब स्वर्गीय) पाण्डेय जगन्नाथ प्रसाद सिंह के समर्पित रहे आ एकर भूमिका डॉ. विवेकी राय लिखले रहले । एकर प्रस्तुति जइसन हम चाहत रहीं ओइसन ना हो सकल, आ कुछ-ना-कुछ खोट रहिए गइल । बाकिर वर्मा जी हमेशे आपन प्रसन्नते व्यक्त कइले आ छपाई-सफाई के कवनो दोष के शिकायत ना कइले । ई उनकर बड़प्पन रहे ।

‘आखिरी गीत’ के प्रकाशनोत्सव, तनी बड़हन पैमाना पर, पटना के कला एवं शिल्प महाविद्यालय का प्रशाल में, 24 अगस्त 1986 के भइल । पहिले के वर्चस्वी कवि-साहित्यकार आ अब पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति माननीय न्यायमूर्ति श्री प्रभाशंकर मिश्र जी का हाथे एह ग्रंथ के विमोचन भइल । समारोह के अध्यक्षता कइले आचार्य विश्वनाथ सिंह आ डॉ. विवेकी राय विशिष्ट अतिथि रहले । ओही दिने अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के कार्य-समिति के बैठक ओही जगे भइला से, एह प्रकाशनोत्सव में भोजपुरी के प्रतिनिधि विद्वान, साहित्यकार आ कार्यकर्ता जवरा गइल रहले । बड़ा सुन्दर समारोह रहे ई, आ वर्मा जी खातिर शायद भोजपुरी के ई अन्तिमे समारोह रहे, जवना में शामिल भइल रहले ।

‘आखिरी गीत’ का छपाई के समय, ओकर प्रूफ पढ़त खानी हमरा अजबे लागत रहे । लागत रहे, जइसे एकर लेखक हरिशंकर वर्मा ना हवे, जिनका के हम जानत-सुनत बानी । एकरा में उनकर एगो दोसरे व्यक्तित्व हमरा सामने खड़ा बुझाइल । बुझाइल, जइसे वर्मा जी सधुआ गइल होखस । उनका गंभीर चिन्तन-मनन के पहुँचल स्तर के परिचय उनका एही ग्रंथ का वाचन में मिलल । विषय के प्रस्तुति में सहजता आ प्रेषणीयता का साथे-साथे भाषा-शैली के प्रवाह के जवन स्तर उनका एह ग्रंथ में मिलल, ओह से उनका व्यक्तित्व के ँचाई आ गहराई के एगो दोसरे अथाह रूप खड़ा बुझाइल, जवन उनका पहिले के थाहल रूप से भिन्न रहे । आस्थावादी आ उदात्त जीवन मूल्य के प्रवक्ता का रूप में उनका विरल व्यक्तित्व के उभार के परिचय पाके मन अघा गइल । बाकिर, दुनियादारी में डूबल हमरा मानसिकता के बड़ा ‘खोम’ लागल रहे एह ‘आखिरी गीत’ पुस्तक के नाम से । मन आशंका से भर-भर जात रहे । का सोच के अइसन नामकरण एह पुस्तक के कइले ! शायद अज्ञात भविष्य एह नामकरण में आपन आभास देले रहे ।

प्रकाशनोत्सव का बाद वर्मा जी जमशेदपुर गइले त कुछुए दिन बाद निर्भीक जी के चिट्ठी आइल कि वर्मा जी टेल्को के सेवा से समय-पूर्व अवकाश ले लिहले आ अपना बड़ बेटा लेफ्टिनेंट जे.जे. वर्मा का पास कोचीन चल गइले । निर्भीक जी इहो लिखले रहले कि उहाँ से लवटला पर राँची में रहे खातिर चल जइहें ।

राँची आके वर्मा जी हमरा के चट्ठिी लिखले जवना से पहिले के जीवन-क्रम से छुटकारा पवला के सुख-संतोष ध्वनित होत रहे । कुछ दिन बाद, अपना दोसर चिट्ठी में सूचित कइले कि मित्र लोगन के आग्रह पर, मन लगावे खातिर, राँची के जयप्रकाश इंस्टीच्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल रिलेशन्स के डायरेक्टर के पद स्वीकार कर लेले बानी; वेतन-एक रुपया महीना ।

कुछ दिन बाद, हमरा के राँची बोलवले । हमरा आपनो कुछ काम रहे जवनामें उनकर मदद लेबे के रहे । बाकिर तेहूपर राँची-यात्रा के कार्यक्रम टरकत रहल । 1987 का 7 जून के सरकारी काम का सिलसिला में हम राँची पहुँचलीं । साथहीं भोजन भइल आ उनका साथ ही उनकर इंस्टीच्यूट देखे गइली । इंस्टीच्यूट के विकास के योजना हमरा के समझवले हमरा निरीक्षण का काम में जाये के रहे आ उनका ओही दिने अपना एगो मित्र का काम से जमशेदपुर जाए के रहे । ओह मित्र का साथे बस से जमशेदपुर गइले आ आपन गाड़ी हमरा निरीक्षण में जाए खातिर दे दिहले । हमरा आश्चर्य भइल उनका बस से यात्रा कइला पर । पुछला पर बिहँसत कहले कि ‘एही सुख खातिर नू टेल्को के नौकरी छोड़लीं ।’ ‘आखिरी गीत’ के प्रकाशनोत्सव का बाद, 7 जून 1987 के वर्मा जी से हमार पहिल भेट भइल । आ इहे भेंट अन्तिम भेंट हो गइल । जुलाई का दोसरका हफ्ता में जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद् के सचिव श्री कन्हैया सिंह ‘सदय’ का चिट्ठी से मालूम भइल कि 7 जुलाईके वर्मा जी के स्वर्गवास हो गइल- हमरा से भेंट भइला के ठीक एक महीना बाद । मन अवसाद से भर गइल, आ रह-रह के हमरा ओह ‘खोम’ के इयाद पड़े लागल, जवन ‘आखिरी गीत’ नामकरण पर हमरा लागल रहे ।

वर्मा जी आपन काम ‘आखिरी गीत’ के प्रणयन आ प्रकाशन का साथे पूरा कर चुकल रहले; आ अब जाए खातिर आपन मन बना चुकल रहले । ‘आखिरी गीत’ के आखिरी पन्ना पर छपल सिकन्दर आ बूढ़ कउवा के कहानी आ वार्तालाप के इयाद पड़त बा त मन जाने कइसन होखे लागत बा । ‘आखिरी गीत’ के आखिरी पंक्तियन के उधृत करत हम पुण्यात्मा हरिशंकर वर्मा के पुण्य स्मृति के प्रणाम करत बानी

“आगा पीछा एक दिन आवहीं के होई तोहरो दुअरिया पिया, अब तोहार इयाद सतावे ।”

ध्यान दीं: इ आलेख पाण्डेय कपिल जी के लिखल किताब लेखाञ्जलि ले लीहल बा।

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